आसमान से आया नया ख़तरा….

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आसमान से आया नया ख़तर

अतुल शर्मा

पिछले कुछ दिनों से भारत के विभिन्न हिस्सों में टिड्डियों की वजह से बड़ा संकट उत्पन्न हो गया है। राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश के बाद अब हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश भी टिड्डियों की चपेट में है। आखिर क्या कारण है कि टिड्डियों का ऐसा प्रकोप भारत में अचानक बढ़ गया है ? इस संदर्भ में यह विचारणीय है कि इन टिड्डियों की वजह से भारत में कितना और किस तरह का नुकसान होगा, इसका अनुमान लगाना आसान नहीं है। भारत पर टिड्डियों का यह प्रभाव बहुत बड़ी आपदा की तरह है। इस संदर्भ में इससे होने वाले नुकसान और उससे बचाव के लिए हम सब को सतर्क होना होगा।
सबसे पहले भारत के उन क्षेत्रों की पहचान होनी चाहिए जिन पर टिड्डियों का प्रकोप प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पड़ सकता है। यदि संयुक्त राष्ट्र के फ़ूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइज़ेशन के आँकड़ों पर ध्यान दिया जाय तो यह असाधारण भय पैदा करने वाले हैं। प्राप्त आँकड़ों के अनुसार चार करोड़ की संख्या वाला टिड्डियों का समूह 35 हज़ार लोगों के लिए पर्याप्त खाद्य को समाप्त कर सकता है। संयुक्त राष्ट्र की ओर से जारी आँकड़ों में टिड्डियों की वृद्धि के इतिहास के बारे में भी बताया गया है। आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2003-05 के बीच में भी इनकी संख्या में कुछ इसी तरह की वृद्धि देखी गई थी जिसका बड़ा प्रभाव पश्चिमी अफ्रीका की कृषि पर पड़ा था। अनुमान यह लगाया गया कि इनसे अफ्रीका में ढाई अरब डॉलर का नुकसान हुआ था। इससे पहले 1930, 1940 और 1950 के दशक में में भी टिड्डियों की संख्या में भी बढ़ोतरी हुई थी।
टिड्डियों की संख्या में अचानक इस तरह की वृद्धि का कारण इनका तेजी से होने वाला प्रजनन है । इस वर्ष का वातावरण इनके लिए बहुत उपयोगी रहा है। संयुक्त राष्ट्र की सूचना के अनुसार भारी बारिश और चक्रवात ने पिछले साल की शुरुआत में टिड्डियों के प्रजनन में बढ़ोत्तरी की और इस वजह से अरब प्रायद्वीप पर टिड्डियों की आबादी में अचानक वृद्धि हुई। भारत में आने वाली टिड्डियाँ वही से हैं। भारत में टिड्डियों का आगमन पाकिस्तान की सीमा से लगे राजस्थान और गुजरात के कुछ क्षेत्रों की ओर से हुआ है। वैसे तो हर वर्ष पाकिस्तान से सटे हुए कुछ क्षेत्रों में टिड्डियों का हमला होता रहा है लेकिन बीते तीन दशकों में ऐसा पहली बार हुआ है जब टिड्डियों का इतना बड़ा हमला भारत में हुआ है। अब इनका प्रभाव राजस्थान और गुजरात के अलावा उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में भी बढ़ रहा है जो गंभीर चिंता का विषय है।
टिड्डियों का इस समय सर्वाधिक प्रकोप हरी सब्जियों, मक्का, मूंग और फलों पर पड़ रहा है। यही नहीं रिहायसी क्षेत्रों में हरियाली के लिए जो पेड़-पौधे और लताएँ उगाई जाती हैं इन पर भी टिड्डियों का प्रभाव पड़ेगा। अभी यहाँ गर्मी का मौसम है इसलिए इनका प्रकोप पिछली साल की तुलना में कम और दूसरी तरह का है। पिछले साल दिसंबर में पाकिस्तान की ओर से भारत में टिड्डियों का एक बड़ा समूह आया था जिसने गुजरात के किसानों को बहुत अधिक परेशान किया था । उत्तरी गुजरात के कुछ जिलों में टिड्डियों ने सरसों, अरंडी, मेथी, गेहूँ और जीरे की फसल को भारी नुकसान पहुँचाया था। लेकिन इस साल पाकिस्तान के रास्ते आया टिड्डियों का यह समूह राजस्थान और मध्य प्रदेश के अनेक हिस्सों की फसलों को बर्बाद करने के बाद अब उत्तर प्रदेश सहित दूसरे प्रान्तों की ओर बढ़ रहा है। जो गर्मी के फलों, सब्जियों और अन्य फसलों को भी अपना आहार बना रहा है। कुछ विशेषज्ञ इसकी गंभीरता को लेकर बहुत चिंतित है,उनका अनुमान है कि जिस तरह से इन टिड्डियों ने हमला किया है उससे देश में लगभग 8000 करोड़ रूपये के कीमत की मूंग दाल और अन्य फसलों के नुकसान होने का खतरा मंडरा रहा है। लेकिन यह महज अनुमान है, अगर इनका प्रकोप इसी तरह बढ़ा तो फिर हमारे लिए किसी भी तरह का अनुमान लगाना मुश्किल हो जायेगा ।
किसान अपनी ओर से जिस तरह का प्रयास कर रहे हैं उसका बहुत मतलब नहीं है। इसकी गंभीरता को समझते हुए इसके लिए व्यवस्थित योजना के तहत कार्य करने की आवश्यकता है।
अभी तक जितना भी नुकसान दिखाई दे रहा है वह प्रत्यक्ष नुकसान है। लेकिन इसका प्रभाव क्षेत्र अप्रत्यक्ष भी बहुत व्यापक है। यदि ये टिड्डियाँ इसी तरह आगे बढ़ती रहीं तो भारत में पैदा होने वाला पूरा क पूरा आयुर्वेदिक कृषि समाप्त हो जायेगा, जो किसी दूसरे देश की साजिश का हिस्सा भी हो सकता है। यही नहीं भारत के जंगलों में, पहाड़ों पर अनेक तरह की घासें होती हैं जो जीव जंतुओं का आहार बनती हैं। यदि टिड्डियों ने इन्हे भी निशाना बनाया तो भारत में घनघोर परिस्थितिकी संकट उत्पन्न हो जायेगा। इसलिए सरकार के स्तर बात बिगड़ने से पहले ही इसकी गंभीरता को समझना चाहिए। इसका दायरा सिर्फ कृषि तक नहीं है, बल्कि कृषि के साथ पर्यावरण भी है जिसे ये संकट में डाल सकते हैं।

(ये लेखक के व्यक्तिगत विचार है और लेखक अवध इंटर्नैशनल फ़ाउंडेशन के संस्थापक है।)

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