किसान आंदोलन पूर्णतया प्रायोजित है ?

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पार्थ दीक्षित की रिपोर्ट

सन् उन्नीस सौ अठानवे में जब भारत के प्रधानमन्त्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेई जी थे। उन्होंने कृषि व कृषकों की समस्या को समझने व निपटाने के लिए किसानों से उनकी समस्या पूछी। किसानों ने सुझाव रखा कि कांट्रेक्ट फार्मिंग के साथ-साथ प्रोसेसिंग यूनिट को प्रत्यक्ष खरीद की सुविधा मिले तो इससे उनको बहुत लाभ होगा। प्रधानमंत्री जी ने इसका कारण जानना चाहा तो उत्तर मिला कि किसान कांट्रेक्ट फार्मिंग से बासमती या कोई दूसरी फसल तो पैदा कर लेगा, लेकिन यदि कोई प्रोसेसिंग यूनिट उसे नहीं खरीद सकेगी तो खेती का क्या लाभ? (स्त्रोत- दैनिक जागरण)
उस समय जो कि वर्तमान से बीस-बाईस वर्ष का अंतराल रखता है, में भी भाजपा नीत सरकार ने कृषकों की
दुविधाओं, कठिनाइयों को जानने का और दूर करने का यत्न किया था। किन्तु आज के किसान आन्दोलन की कल्पना करके ही कोई भी ठोस कदम नहीं उठाया गया होगा। नए युग की भाजपा प्रयोगात्मक राजनीति के लिए जानी जाती है। जो भी चीज़ें दशकों से रुकी हुई हैं, उनपर निर्णय लिए जा रहे हैं, कानून बन रहे हैं और कार्यान्वयन भी हो रहा है। तीन तलाक़ बिल, तीन सौ सत्तर, नोटबन्दी, जीएसटी और इसी क्रम में कृषि कानूनों का भी निर्माण किया गया है।

इन्हीं कृषि कानूनों को लेकर किसान (विशेष तौर पर पंजाब-हरियाणा के किसान) दिल्ली सीमा पर घेरा डाले बैठे हैं। सरकार से साथ किसान संगठनों के प्रतिनिधियों की कई दौर की वार्ता हो चुकी है, प्रधानमंत्री स्वयं कई किसान संगठनों के पदाधिकारियों और सीधे किसानों से ऑनलाइन वीडियो कॉल के माध्यम से सम्पर्क साध चुके है।

किसान बिल की बात करें तो- तीन तरह के कानून संसद से पारित किए गए हैं।
१- कृषि उत्पाद व्यापार वाणिज्य अधिनियम २०२०- इसके अन्तर्गत एपीएमसी यानि कि किसी मण्डी तक सीमित रहने के लिए बाध्य नहीं होना पड़ेगा। इस कानून के आ जाने से मण्डियाँ लेवी या चार्ज के नाम पर लूट नहीं कर सकेंगी। मण्डियाँ किसानों से औने-पौने मूल्य पर खरीदकर नौ-दस गुने अधिक मूल्य पर उत्पाद बेचती हैं, जिसमें हर दृष्टि से किसान का ही अहित है। यदि खेती का लागत मूल्य भी न मिले तो कोई भी किसान खेती करेगा ही क्यूँ?

२- मूल्य आश्वासन व कृषि सेवा विधेयक २०२०- यह दूसरा कानून अनुबन्ध कृषि की दिशा में सुरक्षा का माहौल बनाने में मील का पत्थर सिद्ध होगा। अनुबन्ध कृषि में तमाम कम्पनियाँ किसानों से किसी फसल को उगाने का एक निश्चित मूल्य पर अनुबन्ध करती हैं। यह एक संशोधित कानून है जिसमें किसान अपनी शर्तों पर अनुबन्ध करने के लिए अधिकृत होगा न कि उसे दूसरे के द्वारा की जाने वाली दया पर निर्भर रहना है। इसमें विवाद निपटान के लिए भी प्रावधान किए गए हैं।

३- आवश्यक संशोधन अधिनियम २०२०- यह अधिनियम असीमित भण्डारण शक्ति प्रदान करता है। युद्ध, सूखा व अन्य आपात स्थितियों में सरकार भण्डारण का नियन्त्रण करेगी। इससे खाद्य आपूर्ति श्रृंखला व्यवस्थित होगी। कोल्ड स्टोरेज की आवश्यकता बढ़ेगी, रोजगार का सृजन होगा।

जब से यह तीन कृषि कानून अस्तित्व में आए हैं, तब से इसपर बहस छिड़ी हुई है। एक औसत दर्जे का मस्तिष्क भी इन कानूनों को पढ़कर इतना तो समझ सकता है कि इससे और कुछ भी हो लेकिन किसानों का अहित तो कतई भी नहीं है। तो प्रश्न उठता है कि विरोध के बिन्दु क्या है? दिल्ली की सीमा घेरे लोग कौन है? अपना ही हित किसानों को हजम क्यूं नहीं हो रहा है?

तो इसके भी अच्छे-भले कारण हैं। चूंकि मैं तो एक किसान परिवार से हूँ तो ज़ाहिर सी बात है कि मैं एक किसान के लिए उसके खेतों का, उसकी फसल का, उसके श्रम का, उसकी आशा का मूल्य बेहतर तरीके से समझता हूँ। मेरे घर में कई क्विंटल धान रखा हुआ है, वह इसलिए क्योंकि एजेंट दस रूपए किलो से अधिक मूल्य देने को तैयार नहीं है और सरकारी मण्डियों पर रजिस्ट्रेशन कराने पर अठारह रुपए प्रति किलो का दाम मिल रहा है। अब नये कानून के अनुसार, मैं चाहूँ तो इसे दूसरी मण्डी या दूसरे प्रदेश में भेजकर अपनी फसल का अधिक मूल्य पा सकता हूँ।

तब विरोध की जड़ कहाँ है? तो इसका उत्तर है कि आन्दोलन या विरोध दो कारणों से होता है। प्रथम तो विरोध करने की कोई विशेष वज़ह हो और दूसरे कि विरोध के लिए विरोध करना हो। इस तथाकथित कृषक हितैषी आन्दोलन में उपर्युक्त दोनों ही वजहें गड्डमड्ड हो गईं है। कुछ जन्मजात भाजपा विरोधी सड़क पर आए हैं और कुछ किसानों को भ्रम में डालकर उन्हें साथ लाए हैं। इन सभी किसान/अकिसान आन्दोलनकारिओं का बिना किसी चर्चा-परिचर्चा, वाद-परिवाद के मात्र एक ही उद्देश्य है- कृषि कानूनों को वापस ले लिया जाए, यद्यपि उनकी ओर से अभी तक एक भी कारण ऐसा नहीं मिल पाया जिसका निदान कर दिया जाए तो यह घेराव थमे। सरकार से वार्ता में भी किसानों के प्रतिनिधि एक भी कारण पर एकमत नहीं हो सके जिसके लिए वे आन्दोलनरत हैं। लेकिन कृषि कानूनों को सरकार द्वारा वापस न लेने पर लगातार धरने की धमकी दी जा रही है।

किसानों की ओर से न्यूनतम समर्थन मूल्य को ख़त्म करने का भी मुद्दा जोर-शोर से उठाया जा रहा है। जोकि कोरी अफवाह के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। एमएसपी की गारण्टी तो कभी ऑन पेपर नहीं थी, लेकिन एसएसपी समाप्त करने का कोई भी संकेत सरकार के किसी भी भाग द्वारा नहीं दिया गया है। एसएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) किसानों के लिए सुरक्षा कवच है। जिसमें मूल्य बाजार के हवाले न होकर कृषि मन्त्रालय के फॉर्मूले पर निर्धारित होता है। भारत सरकार द्वारा बार बार यह चीज़ें दोहराई जा रही हैं कि जैसा प्रोपागेंडा अनावश्यक खड़ा किया गया है उसका कोई आधार नहीं है। किन्तु अब विलम्ब हो चुका है। कृषि कानूनों को पारित करने से पूर्व और पश्चात् सरकार को कृषक संगठन प्रमुखों को विश्वास में लेना चाहिए था। उनके सामने सभी प्रावधानों, उससे सम्बन्धित लाभों को विस्तारपूर्वक साझा किया जाना चाहिए था। यदि यह सावधानियाँ बरती गईं होतीं तो आज स्थिति नियन्त्रण में होती।

किसानों के कंधे पर बंदूक रखकर निशाना लगाने वालों को भ्रम और अफवाह फैलाने का अवसर ही नहीं मिलता। किसान आन्दोलन की आड़ में राष्ट्र विरोधी तत्त्व खालिस्तान की मांग फ़िर उछाल रहे हैं। समुदाय विशेष की वेशभूषा का प्रयोग करके देश के विरूद्ध चालें चली जा रही हैं। इन षड्यंत्रों को देखने व समझने के लिए सूक्ष्म दृष्टि चाहिए। शीघ्रातिशीघ्र सरकार को इस आन्दोलन के गुरुत्व केन्द्र पर वार करना चाहिए, अन्यथा दूसरा शाहीन बाग बनते देर नहीं लगेगी।

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