हाईवे के किनारे बिना लाइसेंस चल रहे ढाबे रेस्टोरेंट

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मनीष अवस्थी


रायबरेली– जनपद में वैसे तो हाईवे किनारे व अंदर कुल 200 से अधिक ढाबे संचालित हो रहे हैं जिनमें से 80 फ़ीसदी ढाबों के पास ना तो खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन का पंजीकरण है और ना ही शॉप एक्ट में रजिस्ट्रेशन है। इन लोगों के पास जब यही नहीं है तो फायर ब्रिगेड की एनओसी का होना तो बहुत दूर की बात है। उधर कुंभकर्णी नींद में लीन एफएसडीए त्योहारों के सीजन में कुछ लोगों पर कार्यवाही कर अपना कोरम पूरा कर रही है। वहीं आम जनता का दावा है कि विभाग की मिलीभगत से यह पूरा खेल चलता है। जिले के बहुतायत होटलों व ढाबों में खाने-पीने का मामला राम भरोसे चल रहा है। घर से बाहर खाना पीना करने के लिए ऐसे हर 5 में से केवल एक ठिकाने के पास फूड सिक्योरिटी लाइसेंस है। बाकी के सब बिना लाइसेंस के ही ढाबा रेस्टोरेंट का संचालन किया जा रहा है। इसके अलावा किसी के पास किसी प्रकार का कोई लाइसेंस भी नहीं है। किसी के पास भी मानक के अनुरूप वाहनों के पार्किंग के लिए जगह भी नहीं है। लिहाजा देर शाम ढाबा रेस्टोरेंट के बाहर वाहन खड़े होने से सड़क पर जाम लगना भी आम बात है। आलम यह है कि हाईवे की रोड पर वाहनों का हुजूम देखा जाता है जो दुर्घटनाओं का कारण बनता है वहीं विभागीय अधिकारी कुछ लोगों पर कार्यवाही कर अपना कोरम पूरा कर लेते हैं। उधर आम जनता उक्त होटलों और ढाबों पर बना खाना खाकर विभिन्न रोगों का शिकार बन रही है। बिना मानकों के खाना परोसा जा रहा है और मनमाने दाम लिए जा रहे हैं। हालात यह है कि राज्य सरकार ने भले ही रात 8:00 बजे के बाद शराब की बिक्री पर पाबंदी लगा रखी हो लेकिन हाईवे के किनारे स्थित अधिकांश ढाबों पर देर रात तक शराब और बीयर की खुलेआम चुस्कियां ली जा रही है। क्षेत्रीय पुलिस और आबकारी अधिकारियों के संरक्षण में चल रहे ज्यादातर ढाबों पर आए दिन मारपीट की घटनाएं भी होती रहती हैं।


ढाबा रेस्टोरेंट संचालन के लिए जरूरी है लाइसेंस


ढाबा और रेस्टोरेंट उद्योग की शुरुआत करने के लिए स्थानीय प्रशासन जैसे नगर निगम, नगर पालिका, नगर पंचायत, ग्राम पंचायत आदि से बिजनेस की परमिशन लेनी होती है। इसके अलावा फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड अथॉरिटी ऑफ इंडिया से लाइसेंस और खाद्य सुरक्षा विभाग से फूड लाइसेंस लेना भी अनिवार्य होता है। यहां तक कि ढाबे का नाम रखकर उसका भी रजिस्ट्रेशन कराना होता है। पर्यावरण विभाग से रजिस्ट्रेशन के अलावा जीएसटी के दायरे में ढाबे का टर्नओवर आने पर जीएसटी नंबर लेना भी जरूरी है।


लोगों की प्रतिक्रियाएं


शिक्षक हरे कृष्ण पांडे कहते हैं ढाबा शहर की हलचल से दूर हाईवे के किनारे खोलना चाहिए। प्रायः लंबी दूरी से आने वाले ट्रक और पर्यटकों की बसें एकांत एवं शांति प्रिय स्थलों पर रुकना पसंद करती हैं।


एडवोकेट वीरेंद्र गौतम कहते हैं कि हाईवे किनारे पर बने कुछ ढाबों में मानक के अनुरूप खाना नहीं परोसा जाता है। साथ ही खाने की कीमत भी अनाप-शनाप मांगी जाती है। ग्राहकों और संचालकों में मारपीट तक हो जाती है।


साकेत त्रिपाठी का कहना है कि ढाबे का बिजनेस से पहले बिजनेस प्लान बनाना आवश्यक होता है। व्यापार कैसे किया जाए उससे मुनाफा कैसे कमाया जाए इन सब का विवरण प्लान में होना चाहिए।


विपिन बाजपेई कहते हैं देर रात तक शराब परोसे जाने वाले ढाबों पर प्रशासन की नजर होनी चाहिए। ऐसे ही स्थानों पर मारपीट की घटनाएं होती हैं तमाम शिकायतों के बाद भी आबकारी विभाग मौन ही बना रहता है।

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