भारत-चीन के बीच युद्ध मे भारत की वर्तमान स्थिति– अतुल शर्मा

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1947 में जब भारत आजाद हुआ था तो उसने ये साफ कर दिया था कि वो एक शांतिप्रिय देश बनने के राह पर है और वो अपने सैन्य ताकतों के ऊपर ज्यादा खर्च नहीं करेगा। लेकिन उसके बाद ऐसे बहुत से मौके आएं जिसके बाद भारत को समझना पड़ा कि सैन्य ताकतें ही देश की ढाल है और बहुत जरूरी है इस ढाल को देश का रक्षा कवच बनाना।
1950 में भारत सरकार ने भारतीय सेना की भूमिका तय कर दी थी जिसके अनुसार भारतीय सेना.. किसी भी तरह के विदेशी आक्रमण होने पर ही जवाबी कार्यवाई करेगी और इसके अलावा शांतिपूर्ण कार्यों के लिए सरकार की मदद करेगी। उस समय भारत के प्रधानमंत्री पंडित नेहरू को सेना पर खर्च बढ़ाने के बजाए विकास कार्यों पर खर्च करना ज्यादा महत्वपूर्ण लगा। लिहाजा सेनाओं के आधुनिकीकरण और जवानों के प्रशिक्षण पर विशेष ध्यान नहीं दिया गया। लेकिन 1962 में जब आजाद भारत के सैनिकों ने जब अपना दूसरा युद्ध चीन से लड़ा तो भारत को नतीजन हार का सामना करना पड़ा।
इस युद्ध में भारत की हार बाद स्थिति साफ़ हो गई कि भारत को अपने सैन्य ताकतों को भी मजबूत करना होगा ताकि कोई भी देश भारत पर आक्रमण करने से पहले सोचे और भविष्य में कही फिर कभी 1962 जैसी स्थिति आती भी है तो भारत में इतनी कुशलता हो कि भारत युद्ध लड़ सके और अंजाम जीत हो हार नहीं….।
हुआ भी कुछ ऐसा ही….1965 में पाकिस्तान से हुए युद्ध में भारतीय सेना ने दुश्मनों से जमकर मुकाबला किया और ये पहला युद्ध था जिसमें भारतीय थल सेना को वायु सेना का पूरा-पूरा सामरिक सहयोग मिला और भारतीय सेना लाहौर तक पहुँच गई तब पाकिस्तान को मध्यस्थता की ज़रूरत पड़ी और ताशकंद में दोनों देश के बीच बातचीत के बाद समझौता हुआ जो ताशकंद समझौता कहलाया।
1971 के युद्ध की बात करें तो इस युद्ध को भारतीय सेना के शौर्य, कौशल और सफल कुटनीति के लिए भी जाना जाता है। इस जंग में मिली जीत भारत की तीनों सैनाओं की सुझ-बूझ और साथ का नतीजा था। आधुनिक विश्व के सामरिक इतिहास में इतना बड़ा सैन्य समर्पण कभी नहीं हुआ था। दुनिया भारत के सैन्य कौशल का लोहा मानने लगी। दोनों देश फिर से समझौते की कुर्सी पर बैठे और निष्कर्ष शिमला समझौता रहा।
1999-कारगिल युद्ध… इस युद्ध में एक नहीं कई संघर्ष थे। ऊचाई और हिमालय पर पसरी बर्फ की चट्टानें तो संघर्ष की महज पहली कड़ी थी। दूसरा दुश्मन ऊचाई पर बैठा था इसलिए सैनिक केवल रात में ही चढ़ाई कर सकते थे। श्रीनगर से 215 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह वो हिस्सा है जो जोजिला पास बंद होने के कारण साल में करीब 7 महीने बंद ही रहता है। कारगिल युद्ध इसलिए भी कठिन माना जाता है क्योंकि उस युद्ध में भारतीय सैनिकों को दुश्मनों के साथ-साथ समुद्र तट से करीब 16000 से 18000 फीट की ऊचाई से भी लड़ना था। लेकिन इस युद्ध के दौरान भारतीय थल सेना ने अपनी तकनीक, पराक्रम और शौर्य की बहुत सी ऐसी कहानियां लिखी जो दूश्मनों को इस बात का अंदाजा दे सकती है कि भारत के पास युद्ध के हर वो दाव-पेंच हैं जो जीत की राह आसान कर सकती है।
आज भारत के युद्ध के अनुभवों की बात हम इसलिए कर रहे हैं क्योंकि भारत-चीन से सीमा विवाद दिन-प्रतिदिन उलझता ही जा रहा है। चीन की तरफ से सीमा पर कभी सैन्य गतिविधियां बढ़ा दी जाती हैं तो कभी भारतीय सैनिकों पर हमला किया जाता है। इस तरह सीमा पर हमेशा विवाद की स्थिति बनी रहती है। 1962 के युद्ध के बाद आज भी इन दोनों देशों के बीच में सीमा से जुड़े कुछ इलाकों को लेकर विवाद चला आ रहा है है।लेकिन इन सीमा विवादों को हवा तब मिली जब 2017 में भारत ने पठारी क्षेत्र (डोकलाम) में चीन के सड़क बनाने की कोशिश का विरोध किया। ये इलाका वहां है जहां चीन और भारत के उत्तर-पूर्व में मौजूद सिक्किम और भूटान दोनों की सीमाएं मिलती हैं। चीन इस इलाके पर अपना दावा करता रहता है। भारत को चिंता है कि अगर इस सड़क का काम पूरा हो गया तो इस सीमा से लगे भारत के हिस्से जो देश के उत्तर पूर्वी राज्यों को जोड़ता है पर 20 किलोमीटर के इलाक़ों पर चीन की पहुंच बढ़ जाएगी। ये वही इलाका है जो भारत को (सेवन सिस्टर्स) नाम से जानी जाने वाली उत्तर पूर्वी राज्यों से जोड़ता है और भारत के लिए सामरिक रूप से भी बेहद महत्वपूर्ण है।
यही वो विवाद का कारण है जिसके बाद भारत और चीन के बीच तनाव बढ़ता गया और युद्ध के कयास लगाए जाने लगे। लेकिन अगर युद्ध की स्थिति की बनती भी है तो ये जानना बेहद जरूरी हो जाता है कि 1962 के बाद भारत की अपेक्षा चीन का युद्ध को लेकर तकनीक अनुभव क्या कहता है।
अगर भारत की अपेक्षा 1962 के बाद चीन के द्वारा लड़े गई लड़ाईयों पर ध्यान दें तो 1967 में चोला और नाथूला पास पर चीन द्वारा लड़ी गई 10 दिन की लड़ाई में चीन को करारी हार का सामना करना पड़ा और उस युद्ध में चीन के 300 से अधिक सैनिक मारे गए थे।
1969 में आमूर और उसुरी नदी के तट पर रूस और चीन के बीच युद्ध हुआ था। इस युद्ध में चीन की हालत इतनी खरीब हो गई थी कि उसे क़दम पीछे खींचने पड़े थे।
अब बात करते हैं 1979 की जब चीन ने वियतनाम पर हमला किया था करीब एक महीने तक चले के इस युद्ध में चीन बुरी तरह हार गया था। इस लड़ाई में चीन के करीब 20000 हजार सैनिक मारे गए थे।
हालांकि चीनी सेना की कमान वहा के राष्ट्रपति के हाथ में ही होता है लेकिन चीन में राष्ट्रपति वहां की कम्यूनिस्ट पार्टी चुनतीं है इसलिए चीनी सेना के कमान की पारदर्शिता पर हमेशा सवाल उठते रहे है । वास्तव में चीन में सेना पर पुरा नियंत्रण चीन की कॉम्युनिस्ट पार्टी के हाथ में है ।
भारतीय सेनाओं की कमान भारत के राष्‍ट्रपति के पास है इसलिए भारतीय सेना की अनुशासन और पारदर्शिता को लेकर कोई सवाल उठाना कठिन है हालांकि राष्ट्र के रक्षा का दायित्व मंत्री मंडल के पास होता है लेकिन इसका निर्वहन रक्षा मंत्रालय द्वारा किया जाता है। इस मंत्रालय के अतंर्गत भारत की सैन्य ताकतों को एक रूपरेखा और नीति तैयार होती है और उसी के तहत सेनाओं को जानकारियां दी जाती हैं।
भारत-चीन के बीच युद्ध के जो कयास लगाए जा रहे हैं इसपर हार्वर्ड केनेडी स्कूल स्थित (‘बेलफर सेंटर फॉर साइंस एंड इंटरनेशनल अफेयर्स’) ने एक रिसर्च पेपेर प्रकाशित किया है कि अगर युद्ध होता है तो इस लड़ाई की रणनीति क्या होगी। इस रिसर्च पेपर में भारत और चीन के रणनीतिक संसाधनों के तुलनात्मक डेटा का विश्लेषण किया गया है।
ये डेटा संकलन “प्रकाशित खुफिया दस्तावेज, क्षेत्रीय राज्यों से हासिल निजी दस्तावेज के आधार पर है। रिसर्च में अनुमान लगाया गया है कि चीन के सीमावर्ती इलाकों के पास भारत के कुल उपलब्ध स्ट्राइक फोर्स में सैनिकों की संख्या करीब 2,25,000 है। इसकी तुलना में पश्चिमी थिएटर कमांड के तहत और तिब्बत, शिनजियांग मिलिट्री जिलों में चीनी ग्राउंड फोर्स 2,00,00 से 2,30,000 के बीच होने का अनुमान किया गया। लेकिन फिर स्टडी में चीन के आंकड़ों को गलत भी बतलाया गया। गलत इसलिए क्योंकि ऐसा माना गया कि युद्ध के दौरान इन बलों का खासा हिस्सा उपलब्ध नहीं हो सकता है क्योंकि वो हिस्सा रूसी टास्क्स के लिए या फिर शिनजियांग और तिब्बत में विद्रोह को काउंटर करने के लिए आरक्षित है।
रिसर्च के मुताबिक चीनी वायु सेना भी सीमा क्षेत्र में भारतीय वायु सेना के मुकाबले गिनती में कम है। चीन की वेस्टर्न थियेटर कमांड इस क्षेत्र के सभी क्षेत्रीय स्ट्राइक एयरक्राफ्ट्स को कंट्रोल करती है। इनका एक अनुपात “रूस केंद्रित मिशन्स” के लिए भी रिजर्व रखा जाता है। स्टडी की माने तो चीन ने इस थियेटर में लगभग 101 (चौथी पीढ़ी) के लड़ाकू विमान रखे हुए हैं.. जिसमें रूस की ओर केंद्रित डिफेंस भी शामिल हैं। दूसरी ओर भारत ने चीन की तुलना में 122 भारतीय समकक्ष तैनात कर रखे हैं जिनका निशाना सिर्फ चीन की ओर ही केंद्रित है।
स्टडी में ये यह भी कहा गयी है कि चीनी सेना के किसी भी तरह के बड़े मूवमेंट की भनक भारतीय और अमेरिकी खुफिया एजेंसियों को पहले ही लग जानी चाहिए थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और नतीजा ये हुआ कि सीमावर्ती क्षेत्रों के पास बड़े चीनी सैन्य अभ्यास को एक छल के रूप में इस्तेमाल किया गया था, फिर उसे वापस निर्धारित न पोजीशन्स की ओर मोड़ दिया गया।
स्टडी में दिए राय के मुताबिक चीन के संबंध में भारतीय कूटनीति का एक विशेष लक्ष्य रूस पर केंद्रित होना चाहिए क्योंकि चीन का सबसे करीबी पार्टनर रूस को ही कहा जाता है तो ऐसा हो जाए कि वो उससे पीछे हटने के लिए कहने को हस्तक्षेप करे। रूस ऐसा इसलिए भी कर सकता है क्योंकि वे भी कथित तौर पर चीनी कार्यवाईयों से पहले से ही बहुत परेशान है।
चीन और भारत के सैन्य क्षमता और हथियारों और परमाणु ताकतों की बात करें तो भारत चीन से कुछ कम नहीं है। कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार भारत के पास 110-120 परमाणु-सक्षम मिसाइलें हैं। जैसे कि प्रिथवी 2 (350 किमी), अग्नि 1 (700 किमी), अग्नि 2 (2000 किमी) और अग्नि 3 (3000 किमी) जिन्हें पहले ही देश की रक्षा प्रणाली में शामिल कर लिया गया है। दूसरी ओर अगर चीन की बात करें तो चीन के पास डीएफ श्रृंखला सहित लगभग 250 परमाणु मिसाइलों का एक बड़ा स्टॉक है। ऐसा कहा जाता है कि डीएफ 31ए मिसाइल में करीब 10,000 किलोमीटर से ज्यादा लक्ष्यों को भेदने की क्षमता है।
अगर भारत की वायुसेना की ताकत की बात की जाए तो हमें चीन पर बढ़त हासिल है। चीन के विमान ऊंचाई वाले एयरबेस से उड़ान भरेंगे, वो कम ईंधन और हथियार लेकर ही उड़ सकेंगे। चीन के पास हवा में ईंधन भरने वाले विमान भी नहीं हैं, इसलिए चीन की वायुसेना के मुकाबले भारत की स्थिति बेहतर है। हालांकि चीन के पास हथियारों और परमाणू मिसाइलों का एक बड़ा स्टॉक है लेकिन इसके बावजूद युद्ध में भारत का पलड़ा भारी हो सकता है।क्योंकि अगर भारत-चीन के बीच युद्ध होगा तो ये लड़ाई मैदान की लड़ाई नहीं होगी। ये पहाड़ की लड़ाई होगी..जहां तोप और गोलों से ज्यादा महत्व सेना का होगा। इस युद्ध में भारतीय सेना को पहाड़ों की चढ़ाई करनी होगी। हालांकि चीन के पास यहां एक एडवांटेज जरूर होगा क्योंकि वो हमशे ज्यादा ऊंची जगह पर बैठे हैं।
लेकिन भारतीय सैनिकों के बात करें तो उनके पास तकनीक और अनुभव है क्योंकि ये युद्ध बिल्कुल कारगिल जैसा होगा क्योंकि दुश्मन यहां भी पहाड़ों(ऊचाई) पर होगा और हम नीचे जमीन पर लेकिन भारतीय सैनिकों के पास होगा युद्ध के तकनीक और जीत के रूप में मिला अनुभव जिसकी मदद से भारतीय सैनिक ऊचाई और दुश्मन दोनों को हराने के लिए सक्षम होंगे।
इसके अलावा अगर स्टडी में किए गए दावें सटीक रहे तो भैरतीय सैनिकों के पास बहुत से एडवांटेज होंगे। साथ ही इस अभी के दौर में जिस तरह अधिकतर देश खासकर अमेरिका जैसे देश चीन से नाराज चल रहे हैं उसका फायदा भी भारत को मिल सकता है। भारत को अगर इस युद्ध में अमेरिका जैसे देशों का साथ मिलता है ते भारत के लिए जीत की राह और आसान हो जाएगी।

( लेखक अवध इंटरनेशनल फ़ाउंडेशन के संस्थापक है )

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