अमेठी:मौसम ने दिया धोखा,कैसे होगी धान की फसल, सरकारी दावे झूठे

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शुकुल बाजार अमेठी: शारदा सहायक सिंचाई परियोजना की दो करें में है तथा इन से पोषित कई अल्पिक आए हैं जिनका संचालन मेन डिवाइस इन्हौना से होता है।  एक रजबहा बाराबंकी से निकलकर अमेठी जनपद के पूरे उरेरमऊ गांव में समाप्त होती है।

जिसकी लंबाई 28 किलोमीटर 800 मीटर है तथा दूसरी भभूत गढ़ी से आरंभ होकर अमेठी जनपद के हरखूमऊ और राजस्व गांव में समाप्त होती है जिसकी लंबाई लगभग 16 किलोमीटर 200 मीटर है इसके अतिरिक्त अन्य कई भी माईनर हैं तथा क्षेत्र में 16 राजकीय नलकूप है विकास खंड बाजार शुकुल ही नहीं जगदीशपुर मुसाफिरखाना में भी किसानों की धान की रोपाई और सिंचाई की चिंता है राजकीय नलकूप अधिकांश बिगड़े हुए हैं इस संबंध में किसान यूनियन के नेता देवी दयाल शर्मा शेषनाथ तिवारी दीपक ओझा तथा किसान यूनियन उत्तर प्रदेश के जिला अध्यक्ष आनंद किशोर से बात की गई तो उन्होंने बताया किस सरकारी सभी दावे किसानों के लिए झूठे साबित हो रहे हैं सिंचाई माफी की घोषणा के बाद नहरों से पानी साफ हो गया है।

राजकीय नलकूप जो बिगड़े हैं उन्हें बनवाने वाला कोई नहीं है जैसे उदाहरण के तौर पर मानस गांव का राजकीय नलकूप कहां है अधिकारी नहीं बता सकते ऐसी स्थिति में सन 1940 का निर्मित सिंचाई विभाग डाक बंगला शुकुल बाजार अपने कर्मचारियों की राह में जो रहा है जहां से नहरों के संचालन व्यवस्था का कार्य देखने के लिए जूनियर इंजीनियर शीशपाल आदि रहा करते थे आज वह डाक बंगला जंगली जानवरों का आशियाना बना है डाक बंगले के किनारे टीम को द्वारा नष्ट कर दिए गए हैं करोड़ों की इमारत धूल धक्षित हो रही है ऐसी स्थिति में किसान चिंतित है मनरेगा योजना द्वारा सिंचाई विभाग की नालियों को साफ कराने का विधान है क्यों कोई भी ग्राम प्रधान नालियों को साफ नहीं करा रहा है जो कानून के मुताबिक है ऐसी स्थिति में किसान अपनी दुर्दशा पर आंसू बहाने को मजबूर है मौसम की दशा के साथ सरकारी दावे भी किसानों के लिए अनुपयोगी साबित हो रहे हैं सबसे जटिल समस्या यह है कि छुट्टा जानवरों द्वारा जो धान लगाए गए हैं चट कर दिए जा रहे हैं जबकि आवारा पशुओं के लिए केंद्र सरकार द्वारा स्थापित किए गए हैं कि नहीं कि नहीं गौशाला केंद्रों पर रात्रि में कोई कर्मचारी नहीं रहते कार्य प्रभारी ग्राम विकास अधिकारी अपने क्षेत्र में निवास ना कर लापरवाही बरत रहे हैं |

*अमेठी से सफीर अहमद की रिपोर्ट*

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