_____तब नाउम्मीदो का सहारा बन हसनपुर आए थे अखिलेश सिंह

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अमित त्रिपाठी
महराजगंज रायबरेली। ”रहने को सदा दहर मे आता नही कोई, तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नही कोई” कैफी आजमी क़ी यह पंक्तियाँ विकासखंड क्षेत्र क़े हसनपुर गांव क़े बच्चे बच्चे क़े जहन मे कौंधती है क्यूंकि इस गांव से जननायक अखिलेश सिंह का दिली रिश्ता रहा है। अखिलेश सिंह क़ी बरखी पर इस गांव क़े लोगो ने भी अपने मसीहा को याद कर बताया क़ी आज क़े 27 बरस पहले आग ने सारे गांव को जला कर राख कर दिया, मंजर ऐसा क़ी सरकारी अमले और आस पास क़े गांवों वालो क़ी मदद क़े बावजूद आग पर काबू पाने मे पूरे सात दिन लग गए। झोपड़ी मे राशन, कपड़े और बच्चों क़े खिलौने सब स्वाहा। तब नाउम्मीदो का सहारा बन हसनपूर गांव आए थे अखिलेश।
बताते चले क़ी 18 नवंबर 1993 दिन रविवार को तहसील मुख्यालय से 10 किमी पर स्थित हसनपुर गांव मे लगी आग ने पूरे गांव को जलाकर राख कर दिया। इस भीषण अग्निकांड से एक युवक क़ी मौत भी हो गयी।
तेज हवाओं क़े चलते इस आग को बुझाने मे लोगो को एक हफ्ते लग गए। तब 34 वर्षीय अखिलेश सिंह गांव वालो क़ी मदद करने को दो ट्रको मे राहत सामग्री भर गांव आए थे। ग्रामीण बताते है कि इन दो ट्रको से पूरे गांव क़े परिवारों क़े लिए बर्तन, गेहूं, चावल, आटा, दाल, सरसो का तेल, केरोसिन, साड़ी, धोती, बच्चों क़े कपड़े, बांटे गए और वही दीनानाथ साहू कि बिटिया का ब्याह नजदीक होने पर 5 हजार रुपए भी अखिलेश सिंह द्वारा दिए गए थे। इस घटना को बीते 27 साल हो गए किन्तु आज भी गांव क़े लोग उस उपकार का बखान करते नही थकते। उनकी प्रथम पुण्यतिथि पर गांव क़े लोगो क़ी आंखे फिर से भीग गयी किसी शायर क़े शब्द ”बिछुडा इस अदा से क़ी रूत ही बदल गयी, इक शख्स सारे सहर को वीरान कर गया” इस गांव मे उनकी अमित छाप को जीवंत करने को काफी है।

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