चीन के ख़िलाफ़ भारत की रणनीति…..

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अतुल शर्मा

पिछले दिनों भारत और चीन के बीच लद्दाख के गलवान घाटी में हुई मुठभेड़ में 20 भारतीय और लगभग 48 चीनी सैनिको की शहादत के साथ खत्म हुई। कुछ इसी तरह 1967 में भी झड़पें हुई थी, जिसमें दोनों पक्षों के सैकड़ों सैनिकों की जान गई थी।उसके बाद का यह सबसे बड़ा संघर्ष है। यह मई के प्रारंभ से वास्तविक नियंत्रण रेखा के साथ चल रहे निर्माण कार्यों के कारण तनावों पर भी प्रकाश डालता है। वैसे तो इस सप्ताह की झड़पों का विवरण अभी भी ठीक-ठीक स्पष्ट नहीं है लेकिन जो है वह कम विचारणीय नहीं है। इस मामले में भारत और चीन दोनों शिथिल सीमांत रेखा को मानते हैं, जो कही भी स्पष्ट नहीं दिखती है। यह 1962 के भारत-चीन युद्ध के अंत में स्थापित क्षेत्रीय नियंत्रण के क्षेत्रों का अनुमान लगाता है जब चीन को हिमालय के पठार पर अपने कब्जे वाले क्षेत्र से बहुत पीछे हटना पड़ा था और यहीं से सीमाओं को लेकर चीन से विवादों का सिलसिला शुरू हुआ।
2019 में वर्तमान केन्द्रीय सरकार ने जब लद्दाख को भारत का केन्द्र शासित प्रदेश घोषित किया तो चीन को भी स्पष्ट शब्दों में एक संदेश दिया कि अब समय आ गया है जब सीमाओं पर विवाद खत्म होने चाहिए और चीन द्वारा कब्जा किया हुआ अक्साईचीन का क्षेत्र भारत को वापस करना चाहिए। चीन की सारी कवायद यही से शुरू होती है और चीन जानता है कि ये लड़ाई सिर्फ़ सेना नहीं भारत का बाज़ार भी लड़ेगा और वहाँ की हार शायद चीन को टुकड़ों में विभाजित कर दे और चीन पर अलोकतांत्रिक तरीके से कब्जा जमाये चीन की कम्यूनिस्ट पार्टी का सफाया हो जाये।
भारत-चीन सीमा के साथ तीन प्रमुख क्षेत्र हैं जो दोनों देशों के बीच तनाव पैदा करते हैं: अरुणाचल प्रदेश; सिक्किम और आस-पास के डोकलाम (जहाँ 2017 में एक प्रमुख झड़प की साइट, जिसने भारतीय सैनिकों को चीन द्वारा बनाई जा रही रणनीतिक सड़क के पूरा होने से रोकने के लिए भूटानी क्षेत्र में प्रवेश करना पड़ा) और लद्दाख। हाल के महीनों में सैन्य संरचना का निर्माण ज्यादातर लद्दाख सेक्टर में हुआ है। सीमित बजट में भी पिछले कुछ सालों में भारतीय सेना ने आधुनिकीकरण पर बड़ा काम हुआ है और इन सबसे अलग सीमा पर पुल और हवाई पट्टियों का निर्माण है, जिसकी वजह से सीमा पर भारतीय गश्तों में बहुत अधिक बढ़ोतरी हुई है।LAC के साथ तीन रणनीतिक क्षेत्रों में विकास हुआ है: गलवान नदी घाटी, जहां इस सप्ताह की घातक झड़पें हुईं; हॉट स्प्रिंग्स, जहां उपग्रह सबूत बताते हैं कि चीनी सेना नियमित रूप से भारतीय क्षेत्र में प्रवेश करती है, और पैंगोंग त्सो। इन बीच जून 15/16 की रात को हुई मुटभेड़ के बाद डी-एस्कलेशन प्रयासों पर चर्चा करने के लिए सीमा पर चीनी और भारतीय जनरलों का मिलना जारी है । भारतीय अधिकारियों ने शुक्रवार को स्वीकार किया कि रात होने से पहले, चीन ने लड़ाई के दौरान जब्त 10 भारतीय सैनिकों को रिहा कर दिया, पर इन सब के बाबजूद सीमा पर दोनो सेनाओं का जमावड़ा जारी है, क्षेत्र के ग्रामीणों और उपग्रह की तस्वीरों में यह स्पष्ट दिखती हैं।
चीन के लिए भी अब भारत 1962 का भारत नहीं है और ये चीन को समझा होगा कि भारतीय वायुसेना को आज भी 1962 के युद्ध में अलग-थलग रहने की टीस है और वायुसेना की माने तो उस युद्ध में अगर वायुसेना ने भाग लिया होता तो उस युद्ध को आज अलग तरीके से लिखा जाता । इस बार सरकार ने स्पष्ट कहा है कि भारत के सशस्त्र बलों को “सभी आवश्यक कदम उठाने के लिए स्वतंत्र हाथ दिया गया है।” भारतीय सेना दुनिया की सबसे बड़ी सेनाओं में से एक है, और भारतीय की तीनों सेनाओं के आधुनिकीकरण का काम बहुत तेज़ी से चल रहा है , जो पूर्ण रूप से स्वदेशी तकनीक पर आधारित है ।
क्षेत्र में बढते तनाव के बीच भारत एक नई क्षेत्रीय ताकत बनकर उभरा है। क्षेत्र में अब भारत की बढ़ती भूमिका को चीन और पाकिस्तान जैसे देश बिल्कुल पसंद नहीं करते हैं। पर इन सब के बीच इस महीने, भारत ने ऑस्ट्रेलिया के साथ एक बड़े रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए, जो दोनों देशों को एक-दूसरे के सैन्य ठिकानों का उपयोग करने की अनुमति देता है। उम्मीद है कि भारत आस्ट्रेलिया को जापान और अमेरिका के साथ होने वाले नौसैनिक अभ्यासों में शामिल होने के लिए आमंत्रित करेगा, ताकि इस क्षेत्र में चीन की समुद्री शक्ति का मुकाबला करने के लिए ऑस्ट्रेलिया, जापान, संयुक्त राज्य अमेरिका और भारत द्वारा प्रयासों को मजबूत किया जा सके। बहुराष्ट्रीय संगठनों में एक बड़े प्रोफ़ाइल के लिए भारत का अभियान भी तेज़ी से आगे बढ़ा है। बुधवार को, इसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में एक आस्थाई सीट के लिए निर्विरोध चुना गया और मई में, भारत ने विश्व स्वास्थ्य संगठन के कार्यकारी बोर्ड के अध्यक्ष की कुर्सी जीती, जहाँ इसने कोरोनोवायरस की उत्पत्ति की तुरंत जाँच करने का समर्थन किया – एक जांच जिसे चीन ने ब्लॉक करने के लिए लड़ा था।
आर्थिक रूप से भारत चीन पर दबाव बनाने के लिए अपने विशाल बाजार का उपयोग करने में अधिक इच्छुक है। अप्रैल में ही भारत ने चीनी संस्थाओं के किसी भी भारतीय निवेश पर सरकार की मंजूरी की आवश्यकता वाले कानून को पारित कर दिया। चीन के लिए एक झटका यह है कि इसकी कंपनियां का विकास विदेशों में निवेश पर निर्भर है । गुरूवार को भारत ने चीनी सामानों पर शुल्क बढ़ाने की योजना पर काम करना शुरू कर दिया है।
उम्मीद है कि अब भारत 5 जी वायरलेस नेटवर्क बनाने के लिए चीनी दूरसंचार कंपनी हुआवेई को अपने बाजार में प्रवेश करने से रोकेगा। इस चीनी कंपनी ने जिस तरह दुनिया भर में दुर संचार की नई तकनीक बेचने के नाम पर चीन सरकार के लिए जासूसी करती थी जो अब जग जाहिर है। चीनी कंपनियों को धीरे धीरे साइडलाइन करना एक नई भारतीय रणनीति होगी और आज का युद्ध सेना के साथ बाजार में भी लड़ा जाता है , और चीन काफी दिनों से यही खेल खेल रहा है। चीन को चीन के ही रणनीति से मारना होगा और यही मौका भी है और जरूरत भी। उदारवाद और लोकतंत्र की रक्षा के नाम पर भारत और चीन के बीच चलती अंतर्राष्ट्रीय खुली व्यापार व्यवस्था को बंद करना होगा, और ये नामुमकिन बिल्कुल नहीं है । चीन की सारी कवायत यही से शूरु होती हैं , और चीन जानता है कि ये लड़ाई सिर्फ़ सेना नहीं भारत का बाज़ार भी लड़ेगा । यही कारण है कि इस बार चीन अपने सरकारी वक्तव्यों में संयमित भाषा का प्रयोग कर रहा है । चीन में बेरोजगारी दर लगभग 32% तक बढ़ गई है और चीन जानता है कि एैसे समय भारतीय बाजार की मार चीन को टुकड़ों में विभाजित कर देंगी और चीन पर अलोकतांत्रिक तरीके से कब्जा जमाये चीन की कम्यूनिस्ट पार्टी का हमेशा के लिए सफाया हो जाएगा ।
विश्व व्यवस्था में दो विचारधाराओं को दुनिया देख रही है एक भारतीय विचारधारा जो दुनिया के साथ है और एक चीन की कम्यूनिस्ट पार्टी की विचारधारा जिसे पुरी दुनिया चाहिए। विश्व एक नये शीत-युद्ध की ओर बढ रहा है। ड्रैगन को रोकना है तो बाजार का मुंह ड्रैगन की तरफ से मोड़ना होगा ।
मेरे बाबूजी कहते थे…” वो नही रहा, ये भी नही रहेगा” ।

( लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं )

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