बच्चों को स्टेटस सिंबल न बनाएं— रजनी दीक्षित (शिक्षिका)

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मोहनलालगंज।उस रोज अखबार में आलोक के अचानक गायब हो जाने की खबर पड़ी तो हैरान रह गई । सोचा,जरूर श्रीमती अस्थाना के होनहार पुत्र का किसी ने अपहरण कर लिया होगा, दूसरे दिन जब श्रीमती अस्थाना से मिलने गई तो पता चला कि आलोक मिल गया है,वह गायब नहीं हुआ था बल्कि अपनी मां के डर से रेलवे स्टेशन के वेटिंग रूम में छुप कर बैठ गया था ।
दरअसल श्रीमती अस्थाना अपनी ननद को अपनी प्रतियोगी मानती थीं । ऐसे में जब उनकी ननद के बेटे ने इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला ले लिया तो उन्होंने भी ठान लिया कि वे भी अपने आलोक को डॉक्टर बनाएंगी, क्योंकि अगर उनका बेटा कुछ नहीं बन सका तो उनकी तो सबके सामने नाक कट जाएगी । बस वे आलोक को दिन रात पढ़ाई के लिए डराने धमकाने लगी कि उसे किसी भी कीमत पर क्लास में फर्स्ट आना ही है । ऐसे में इस साल जब काफी मेहनत के बावजूद आलोक क्लास में फर्स्ट स्थान नहीं ला सका तो माँ द्वारा पिटाई के डर से वह घर से भाग गया ।
सच, बड़ा दुख होता है जब पता चलता है कि आजकल ज्यादातर बच्चे अपने माता पिता के लिए स्टेटस सिंबल बनते जा रहे हैं । बच्चों की आकांक्षाओं का ख्याल रखने वाला कोई नहीं होता उल्टा माता पिता उनसे या आशा करते हैं कि वह कुछ बनकर उनका सिर गर्व से ऊंचा करें ।
ऐसे महत्वाकांक्षी माता पिता बच्चों की छोटी से छोटी गलती भी बर्दाश्त नहीं कर पाते । उन्हें यह लगता है कि उनकी संतान इतनी काबिल हो चुकी है कि जीवन में उससे कहीं कोई गलती ना हो और वह कभी किसी से ना हारे । हर गलती के बाद दुत्कार,व्यंग्यात्मक शब्द या लम्बे- चौड़े भाषण के बाद क ई बच्चे तो हीन भावना से ऐसे ग्रसित हो जाते हैं कि सफलता उनसे कोसों दूर भागने लगती है, और कई बच्चे ऐसे भी होते हैं जो अपने माता-पिता की इच्छा के अनुरूप स्वयं को ढालना तो सीख लेते हैं , लेकिन आगे चलकर अपनी कुंठित भावनाओं का प्रर्दशन विद्रोही और अशिष्ट बनकर करते हैं।
भोजन, कपड़े, खिलौने के अलावा बच्चों को स्नेह और भावनात्मक सुरक्षा की भी जरूरत होती है। जब बच्चे से परिवार में कुछ आकांक्षाएं जन्म लेने लगती हैं तो बच्चे के मन में इसका बुरा असर पड़ता है। वो भी अपने परिवार से अपने हर कार्य के बदले में कुछ उम्मीदें करने लगता है। उसे घर भावात्मक सुरक्षा देने वाला स्थान नहीं प्रतीत होता और वो एक ऐसे स्थान की तलाश शुरू कर देता है, जहां उसे भावनात्मक संतुष्टि प्राप्त हो या जहां वह अपने असंतोष को को व्यक्त कर सके।
अपने बच्चों को स्टेटस सिंबल बनाने के बजाय माता-पिता को चाहिए कि वे अपने बच्चों का उचित मार्गदर्शन करें, ताकि बच्चों का बौद्धिक व मानसिक विकास सही ढंग से हो सके।
आठ वर्षीय प्राची को अपनी नौकरानी की मैले कुचैले कपड़े वाली बिटिया मधु के साथ खेलना अच्छा लगता था। उसे जब भी मौका मिलता वो मधु का हाथ पकड़कर उसे बगीचे के किसी कोने पर ले जाकर बैठ जाती और घंटों उसके साथ बतियाती रहती।
प्राची की मां को यह बिल्कुल पसंद नहीं था कि उनकी लाडली बेटी एक नौकरानी की बेटी के साथ खेले। वो सदैव प्राची को रोकती टोकती रहतीं, लेकिन मधु के प्रति प्राची का लगाव निरंतर बढ़ता ही जा रहा था। मां से छुपकर उसे मिठाइयां खिलाकर वह काफी संतुष्ट होती थी।प्राची की मां सदैव बौखलाईं हुई रहती । उन्हें प्राची का निम्न क्षेणी के लोगों के साथ हंसना बोलना बिल्कुल भी पसंद नहीं था । वे सदैव इस बात से भय खाती थी कि समाज के किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति ने प्राची को नौकरानी की बेटी के साथ देख लिया तो उनकी मां मर्यादा मिट्टी में मिल जाएगी ।
प्राची को जब काफी समझाने पर भी कोई फायदा नहीं हुआ तो तंग आकर प्राची की माँ ने उस नौकरानी को फटकार लगाई और आदेश दिया की वह अपनी बेटी को अपनी साथ ना लेकर आया करें ।
प्राची को मां की इस क्रूर नीति से बेहद सदमा लगा और वह उदास रहने लगी । प्राची ने अपने को पढ़ाई में व्यस्त कर लिया। उसकी मां उसे पढ़ाई में व्यस्त देखकर संतुष्ट हो गई । उन्हें लगा कि उन्होंने अपनी बेटी को सही शिक्षा दी है लेकिन वो नहीं जानती थी कि उन्होंने ना सिर्फ प्राची का विश्वास खो दिया था बल्कि अपने बेटी की नजरों से भी गिर गई थी
हर बच्चे की अपनी क्षमता होती है यदि वह पढ़ाई में अव्वल नहीं है तो उसमें जरूर एक खिलाड़ी एक चित्रकार , गायक , पेंटर के गुण विद्यमान होंगे।
अपने बच्चों से ज़रूरत से ज्यादा उम्मीद कर हम उनके बचपन को तो कुंठित करते ही हैं उनकी युवावस्था पर भी प्रश्न चिह्न लगा देते हैं । कुंठित बच्चों के गुण उभर कर सामने नहीं आते बल्कि उनके अंतर में ही कहीं दम तोड़ देते हैं।
अत: बच्चों की कोमल भावनाओं को अपनी आकांक्षाओं का शिकार न बनने दें बल्कि उनमें व्याप्त गुणों को टटोलने का प्रयास करें। साथ ही जिस क्षेत्र में उनकी रुचि है उस क्षेत्र में उन्हें आगे बढ़ने हेतु प्रोत्साहित करें । ऐसा करने से आप कभी निराश नहीं होंगे बल्कि पाएंगे कि आपके बच्चों ने अपनी कार्य-कुशलता से आपको समाज में ऊंची प्रतिष्ठा दिलाई है।

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