पलायन का महाखेल के पीछे की साजिश—-

0
455

मोहनलालगंज।महामारी में किसी की भी पहचान साजिशकर्ता की नहीं संवेदनशीलता वाली होनी चाहिए। कोई भी आपदा जब आती है तो उसमें मानवीयता की प्रखर पहचान हमें देखने को मिलती है या यह कहें कि प्रकृति भी हमारे मानवीय पक्ष का मूल्यांकन कर रही होती है। कोविड महामारी के बीच बहुत कुछ ऐसा हुआ जिसने मानवता के माथे पर कलंक के अनेक टीके थोप दिये, बावजूद इसके इसमें एक ऐसा पक्ष भी शामिल था जो निरंतर साजिश कर रहा है। वे यह भूल गए उनके किए का प्रभाव किसी पार्टी या सरकार पर नहीं पड़ेगा, बल्कि इसका सीधा प्रभाव महामारी में लाचार और मजबूर हो गए देश की जनता पर पड़ेगा। यह समझने की बात है कि कोविड महामारी के बीच जब सबकुछ सही रास्ते पर जा रहा था, लाकडाउन के बावजूद केंद्र और राज्य की सरकारें सम्मिलित रूप से देश की जनता का पूरा सहयोग कर रही थीं, फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि देश के गाँवों से जुड़ा एक बड़ा हिस्सा जो शहरों में निरंतर जीवनयापन करता रहा है और इस महामारी के समय में सरकार द्वारा लगाये गये लाकडाउन का पालन भी कर रहा था।। सरकारों ने भी सब छोड़कर सिर्फ़ अपने नागरिकों की सुरक्षा को ही प्राथमिकता देना उचित समझा। सरकार का हर महकमा लोगों की सेवा में (जब मैं सेवा कह रहा हूँ तो ये सच है) दिल से लगा था। देश ने पहली बार भारतीय पुलिस का नायक वाला चेहरा देखा जो अभी तक खलनायक के रूप में प्रचलित था। देश में पहली बार ऐसा लगा कि हर व्यक्ति अपने आस-पास के लोगों की चिन्ता कर रहा है। अगर कहीं भी कोई जरूरतमंद दिखता था तो अनगिनत हाथ सहायता के लिये अनायास बढ़ जाते थे जैसे हर कोई अपना हो। फिर ऐसा क्या हुआ कि पूरे देश के मज़दूरों को अचानक घर की याद आने लगी, उन्हे अपना गाँव याद आने लगा और जो शहर उन्हें वर्षों से उनकी आजीविका दे रहा था, पराया लगने लगा? मजदूर दूर देश से अपने गाँव की ओर पैदल ही चल पड़े। हजारों किलोमीटर उन्हें अचानक आसान लगने लगा। स्थिति की ब भयावहता का अनुयामन इस बात से लगाया जा सकता है कि आज देश के सामने आजादी के बाद का दूसरा सबसे बड़ा पलायन खड़ा हो गया है। पर ऐसा क्यों हुआ, क्या इसमें किसी की साजिश तो नहीं है?
इस पर चर्चा करने से पहले कुछ घटनाओं पर नजर डालना बहुत आवश्यक है। कोविड-19 पर पूरी दुनिया चीन के विरुद्ध खड़ी हो रही है। अमेरिका लगातार चीन को इस महामारी का आरोपी मान रहा है। तीन चौथाई दुनिया चीन से अपना व्यापार बंद कर कहीं और ले जाना चाहती है और सबकी पहली पसंद भारत ही है। यह बात चीन को भी बहुत अच्छी तरह पता है। अचानक चीनी सेना लेह में भारतीय सीमा का उल्लंघन कर भारतीय सेना से उलझने लगती है। चीन अचानक ताइवान पर अपनी दावेदारी बढ़ा देता है। सुदूर दक्षिण समुद्र में चीन की गतिविधियों बढ़ जाती हैं। अचानक चीन पूरी दुनिया से उलझने की तैयारी कर लेता है। दुनिया को तीसरे विश्वयुद्ध की आहट सुनाई देने लगती है। इन सबके बीच एक देश और एक नेता जो सबसे मज़बूत होकर उभरता है वह भारत और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं। भारत और नरेंद्र मोदी दुनिया की पसंद बन रहे हैं, जो मज़बूत और सशक्त भारत बनाने का सपना देख रहे हैं और कोविड कहीं न कहीं भारत के लिए एक अवसर जैसा बन रहा है।
फिर यह सवाल उठाना स्वाभाविक है कि मजदूर क्यों लौटना चाहते हैं? वह भी अचानक? समझने की बात है कि जब इतना बड़ा पलायन दुनिया के समाचारों में, ख़ास कर टीवी पर भारतीय एंकरों के अंदाज में दिखेगा तो इससे सबसे बड़ा फ़ायदा किसे और क्यों होगा? एप्पल ने चीन से हटने के अपने फ़ैसले को बदलकर चीन में ही रहना पसंद किया है, यह इसका पहला और जीवंत प्रमाण है। भारत के संदर्भ में हमें बहुत अच्छी तरह पता है कि कॉम्युनिस्ट पार्टी का मज़दूर यूनियन आज भी भारत में बहुत मजबूत और राष्ट्रव्यापी है। लेकिन भारत की मीडिया साजिश के इस सच को दिखाने से या तो चूक गई या फिर किसी न किसी के दवाब में उसने सरकार द्वारा नायक के रूप में खड़ा होने को अचानक से खलनायक जैसा बनाने का प्रयत्न किया। जो भी हो चीन के पक्ष में यह साजिश बहुत गंभीर हुई है, वह भी भारत में रहने वालों के द्वारा। भारतीय कम्युनिष्टों और उनके सहयोगियों ने अपनी प्रतिबद्धता को एक बार फिर चीन के पक्ष में साबित किया है, जिसका भयावह परिणाम इतनी बड़ी संख्या में मजदूरों का बेतहासा पलायन है।

यह लेखक के अपने विचार हैं।
लेखक अवध इंटर्नैशनल फ़ाउंडेशन के संस्थापक है !

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.