हानिकारक ही नहीं मनुष्य के लिए बहुत लाभदायक भी हैं चमगादड़

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*डॉ राम कुमार*

कोरोना वायरस से दुनियाभर में फैली महामारी की वजह से चमगादड़ इन दिनों काफ़ी सुर्ख़ियो में हैं, क्योंकि ऐसा माना जा रहा है, यह वायरस चमगादड़ से ही मनुष्य के शरीर में आया है। चूँकि चमगादड़ को लेकर विभिन्न धर्मों, संस्कृतियों और समाजों में पहले से ही एक नकारात्मक (stereotype) छवि बनी हुई है, इसलिए ऐसी सम्भावना व्यक्त की जा रही है कि कोरोना के बाद की दुनिया में चमगादड़ पर नकरात्मकता में इज़ाफ़ा हो सकता है, जिससे इस जीव के अस्तित्व पर ख़तरा भी उत्पन्न हो सकता है।
इस लेख में चमगादड़ से जुड़े कई सवालों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझने की कोशिश की गयी है? मसलन, चमगादड़ क्या है? चमगादड़ से जुड़ी मान्यताएँ क्या है? मनुष्य के शरीर में चमगादड़ से वायरस के आने की सम्भावना ज़्यादा क्यों होती है? चमगादड़ मनुष्य के लिए लाभदायक कैसे हैं, और भविष्य में किन बातों का ध्यान देना चाहिए जिससे कि ऐसी बीमारियों पर रोकथाम किया जा सके?
चमगादड़ क्या है?
चमगादड़ हमारे आसपास रहने वाला एक एक स्तनधारी जीव है। वैसे अब तक हुए खोज के अनुसार दुनियाभर में स्तनधारियों की संख्या लगभग 6,495 हैं, जिसमें से लगभग 1,400 के आसपास चमगादड़ है। रहन-सहन और खान-पान के आधार पर चमगादड़ को दो उपसमूहों- फलखाने और कीटखाने वाले प्रजातियों में विभाजित किया जाता है। पहले उपसमूह के चमगादड़, जिनकी दुनिया भर में संख्या लगभग 186 है, जो पुराने, लम्बे, छायादार पेड़, घनी पत्तियों और पुराने घरो की छतों में मुख्य रूप से रहते है। उत्तर भारत की क्षेत्रीय भाषा में इन्हें गादुर, गदुरी, चमगोदर और कहीं-कहीं पर पंछी के नाम से भी पुकारा जाता है। दूसरे उपसमूह के चमगादड़, आकार में छोटे होते है जोकि  पुराने घर, खंडहर, पेड़ और दीवार के दरारों आदि में रहते हैं। इस समूह के चमगादड़ के पास आँख नहीं होती है, इसलिए ये अपना शिकार और सफ़र अपने शरीर द्वारा उत्पन्न तरंगों की मदद से करते हैं।
चमगादड़ से जुड़ी मान्यताएँ क्या है?
चमगादड़, रात्रिचर जीव होने के कारण, रात में सभी क्रियाओ के लिए सक्रिय होते है। इनसे जुड़ी नकारात्मक मान्यताओं की बात किया जाए तो इन्हें बुरी आत्माओ का साया, भूत-प्रेत और एक रहस्यमई जीव के रूप में प्रचलित है। कहीं-कहीं ऐसी भी मान्यता है कि जहाँ इनका निवास होता है वहाँ खजाना छुपा होता है। भारत के कुछ हिस्सो में इनको खाने के लिए फल-फूल भी दिये जाते, जिसके पीछे मान्यता है कि ऐसा करने से घर में सुख और समृद्धि बनी रहती है।
मनुष्य के शरीर में चमगादड़ से वायरस के आने की सम्भावना ज़्यादा क्यों होती है?
चमगादड़ में तरह-तरह के वायरस पाए जाते हैं। दुनियाभर में जानवरो से मनुष्यों में होने वाली तरह-तरह की बीमारियो के कारणों पर शोध से पता चला है कि अकेले चमगादड़ के शरीर में लगभग 61 वाइरस होते हैं जो कि मनुष्यों के साथ अन्य जीवों को संक्रमित करते है। ऐसा इनके निवास स्थान में लगातार होने वाले परिवर्तन की वजह से होता है क्योंकि इससे इनके मेटाबोलिस्म में कई प्रकार का फेर बदल होता रहता है जोकि वाइरस के लिए बहुत अनुकूल होता है। झुंड में रहने की वजह से चमगादड़ एक दूसरे के शरीर में वायरस को तेज़ी से फैलाते हैं। चूँकि ये ऐसे जीव हैं जो मनुष्यों के सबसे ज़्यादा आसपास रहते हैं, इसलिए इनसे मनुष्यों में वायरस के फैलने की सम्भावना ज़्यादा होती है।
यदि विज्ञान की भाषा में कहें तो चमगादड़ भी मनुष्य की तरह ही एक मैमल होता है, मैमल उन जीवों को कहा जाता है जो स्तनधारी होते हैं, जिनका दिमाग़ और तंत्रिका तंत्र पीठ की तरफ़ पीछे होता है, ज़्यादा उम्र तक ज़िंदा रहते हैं और प्रायः झुंड में रहते हैं। चमगादड़ के कुछ जीन भी मनुष्य से मिलते हैं, इसलिए भी इससे मनुष्य के वायरस के आने की सम्भावना ज़्यादा होती है।
कोरोना वायरस जिसे COVID-19 कहा जा रहा है, के बारे में शुरू-शुरू में दावा किया गया कि यह चमगादड़ से मनुष्य के शरीर में पहुँचा। अफ़वाह तो इसकी भी फैली कि इसे चीन की किसी प्रयोगशाला में तैयार किया गया है। हालाँकि शोध में ऐसे बातें ग़लत साबित हुई हैं। वायरस के अध्ययन के लिए किसे जाने वाले जेनॉमिक सीकुयन्स एनालिसिस से यह बात सामने आयी है कि COVID-19 का जिनैटिक कॉम्बिनेशन, लगभग 40 साल पूर्व के ख़ोजे जा चुके कोरोना वाइरस से मिलता जुलता है। इस वायरस का मनुष्य के शरीर में प्रवेश सीधे चमगादड़ से न होकर, पंगोलियन नाम के एक इंटर्मीडियट होस्ट माध्यम से हुआ है। एक शोध में मनुष्य के शरीर में ऐसे ज़ीन्स और रिसेप्टर के पाए जाने की संभावना व्यक्त की जा रही है जो कोरोना वाइरस के ज़ीन्स और रिसेप्टर से बिलकुल मिलता-जुलता है, जिसकी वजह से ही शायद यह मनुष्यों को आसानी से संक्रमित कर रहा है।
चमगादड़ मनुष्य के लिए लाभदायक कैसे हैं?
दुनियाभर में पाये जाने वाले सभी जीव-जन्तुओ में, चमगादड़ ही एकमात्र स्तनधारी जीव है जो उड़ने में सबसे सक्षमता के साथ-साथ सबसे तेज़ उड़ने वाला जीव है। ये, एक रात में लगभग 166 किलोमीटर तक की दूरी, खाने के लिए तय करते है और लगभग 1,500 किलोमीटर की दूरी मौसमी प्रवास के समय करते है। रात्रिचर स्वभाव होने के कारण ये रात में फलने और फूलने वाले लगभग 528 प्रजातियों के पेड़ो के परागकण और बीज़ को अलग-अलग प्राकृतिक वास में फैलाते है, जिससे जंगल को प्राकृतिक रूप से स्थापित होने में मदद मिलती है, इसलिए इनको ‘प्रकृतिक जंगल को स्थापित’ करने वाले के साथ-साथ, ‘जंगल का रक्षक’ भी कहा जाता है।
चमगादड परागण के साथ ही विभिन्न प्रकार के कीट-पतंगों का शिकार करते हैं, जिन कीट-पतंगों की वजह से मनुष्य और फसलों को तरह-तरफ़ का रोग होता है। कीट-पतंगे फसलों को भी बहुत नुक़सान पहुँचते हैं, इसलिए चमगादड उनको खाकर फसलो के लिए जैव कीटनाशक का काम करते हैं। अन्यथा फसलों की सुरक्षा के लिए किसानों को रासायनिक कीटनाशको का प्रयोग करना पड़ता है, जोकि मनुष्य के शरीर के लिए हानिकारक होता है। एक अध्ययन से यह भी पता चला है कि एक मादा चमगादड़, गर्भावस्था के दौरान, अपने शरीर के तीन गुगा ज़्यादा वजन तक कीटों का भक्षण कर सकती है इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि एक चमगादड़, अपने जीवन काल (लगभग 30 वर्ष) में किनते कीट खाता होगा?
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखे तो चमगादड़ तिलचट्टे, मेढ़क, मक्खियों और मुख्य रूप से मच्छरों को खाते है। एक छोटा सा चमगादड़, एक घंटे में 1,200 से भी ज़्यादा मछरों को, अपने भोजन के रूप में खाता है। जिन मच्छरों की वजह से ज़ाइका, मलेरिया, टायफायड, डेंगू, चिकनगुनिया जैसी प्रमुख बीमारियाँ फैलती जिसकी रोकथाम के लिए सरकार को करोणों रुपए प्रतिवर्ष खर्च करना पड़ रहा है।
इन सबके अलावा चमगादड़ की सुनने की क्षमता बहुत ज़्यादा होती है जिसकी वजह से ये प्राकृतिक आपदा जैसे तूफान, भूकंप आदि के आने पर अपने व्यवहार में परिवर्तन करते हैं, जिससे मनुष्य को भी इन ख़तरों की जानकारी हो जाती है, इसलिए इन्हें ‘जैविक संकेत’ के रूप में भी देखा जाता है।
भारत में चमगादड़ पर शोध
चमगादड़ भले ही विभिन्न तरीक़े से मनुष्य के लिए लाभदायक है, लेकिन भारत में इस पर शोध बहुत ही कम है, जिसकी वजह से अर्थव्यस्था, मानव स्वास्थ और पर्यावरण में इनके योगदान पर वैज्ञानिक ज्ञान का आभाव है। चूँकि चमगादड़ को लेकर समाज में एक नकारात्मक दृष्टिकोण पहले से ही बना हुआ है, जोकि शिक्षण संस्थाओं और शोध संस्थाओं तक में चला गया है, इसलिए इस पर विभिन्न आयाम से शोध करने में भी काफ़ी मुश्किलें आती हैं। ख़ुद मुझे इस विषय पर शोध करने के लिए चार बार राजीव गांधी राष्ट्रीय फेलोशिप से वंचित होना पड़ा था।
चूँकि अब जंगल तेज़ी से कट रहे हैं, जिसकी वजह से चमगादड़ जैसे तमाम वन्य जीव तेजी से या तो समाप्त हो रहे हैं या फिर मनुष्यों के सम्पर्क में आ रहे हैं, इसलिए कोरोना जैसी तमाम और बीमारियों पर ख़तरा बढ़ता जा रहा है। अतः समय रहते भारत सरकार को सचेत हो जाना चाहिए और चिकित्सा के साथ-साथ, वन्य जीवों पर भी शोध बढ़वा देना चाहिए।

*लेखक : डॉ राम कुमार, श्रीवेंकटेश्वर यूनिवर्सिटी में जीव विज्ञान के सहायक प्रोफ़ेसर हैं, और बाबासाहेब अम्बेडकर विश्वविद्यालय, लखनऊ से चमगादड़ पर पीएचड़ी किया है।*

मो: +91 94523 04438

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