सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे भवन्तु निरामया:।

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रिपोर्ट मुकेश मिश्रा

एक ऐसा परिवार जो दीन दुखियों की निस्वार्थ कर रहा है

निगोहां, लखनऊ।एक ऐसा परिवार जो लोगों की प्रतिदिन सेवा करता है किंतु सुर्खियों में में नहीं रहना चाहता है।जी मैं बात कर रहा हूं निगोहां में रहने वाले ऐसे परिवार की जो देश सेवा के बाद अब समाज की सेवा में लगा हुआ है। यह परिवार करनी करता है किंतु कथनी से परहेज़ करना नहीं भूलता है। इस परिवार के हर व्यक्ति में कूट कूट कर सेवा भाव प्रर्दशित होता है। यह परिवार आध्यात्मिकता के हर पहलू को अपनाने के प्रयास में लगा हुआ है।उसका कहना है कि खिलाना और बांटना अध्यात्म के द्वारा विश्लेषण करता है।
यह तस्वीरें देख रहे हैं आप,यह उस शक्स की हैं,जो लगातार सेवा कर रहा है सुर्खियों में नहीं आने वाला पहला व्यक्ति है जो फोटो खिंचवाने से भी गुरेज करता रहा है। इस परिवार में धीरज द्विवेदी ,राखी द्विवेदी, रवि प्रकाश द्विवेदी ,अभिवादन भी करता है निवेदन भी करता है कि सुर्खियों में मत लाओ हमको,लेकिन हम मीडिया की सुर्खियों में लाएंगे नहीं तो मीडिया किस बात का है। ऐसे लोग समाज के आइने की तरह है। *पेश है बातचीत के कुछ अंश*
किसी को भी खाना खिलाना हो किसी गरीब को या किसी असहांय को जो किसी भी विपदा में पड़े हुए हैं,।
खिलाने का कार्य व्यक्ति के लिए अच्छी बात है, खिलाना भी चाहिए, एवं कोई यह कहता है कि मैं खाना के पैकेट बांटने जा रहा हूं या मैं खाना बांटने जा रहा हूं किसी गरीब समुदाय में अच्छी बात है, बांटना चाहिए, क्योंकि बांटना भी शब्द बहुत बड़ा भ्रमित शब्द होता है, मनुष्य कुछ नहीं कर सकता है, उससे कराया जा सकता है, खिलाना शब्द भी केवल परमेश्वर के लिए ही जाता है,। इसके विषय मे पवित्र गीता के एक श्लोक की व्याख्या किया और बताया मे गीता अध्याय: 15
श्लोक 17 का बखान किया और कहा
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः॥
इन दोनों से उत्तम पुरुष तो अन्य ही है, जो तीनों लोकों में प्रवेश करके सबका धारण-पोषण करता है एवं अविनाशी परमेश्वर और परमात्मा- इस प्रकार कहा गया है
क्योंकि व्यक्ति विशेष किसी को खिला नहीं सकता है, क्योंकि वह खुद दर-दर भटक रहा है खाने के लिए, केवल खिलाना या बांटना इसमें भाव परिवर्तित करना चाहिए, किसी को केवल इस भाव से कहना चाहिए जैसे कोई खाना बांटने जाता है तो उसको यह कहना चाहिए कि मैं सेवा करने जा रहा हूं, बांटने की जगह पर सेवा शब्द का उपयोग करें। हर कोई आपस में अगर कोई खाना खिलाने जा रहा है तो खिलाने की जगह पर सेवा करने जा रहे हैं। इस शब्द का उपयोग करें। अगर इस शब्द का प्रयोग करोगे तो उसको फल मिलेगा ।सात्विक फल और सेवा शब्द लगाने से सूक्ष्म अहंकार भी समाप्त होता रहता है। जबकि वर्तमान समय में लोग करते कुछ और हैं और सुरक्षा में बने रहने के लिए अधिक से अधिक प्रशंसा कराने में मशगूल दिखाई देते हैं। किंतु यह एक ऐसा परिवार है जो करो ना की महामारी के चलते लाख डाउन के तहत बेसहारा लोगों का सहारा करने के लिए नित्य तत्पर रहता है किंतु सुर्खियां बटोरने से हरदम परहेज करता रहता है।

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